Amarendra Singh

ये इश्क़ है या सजा है कोई रब की

हमने उन राहों से जाना छोड़ दिया,
जिन राहों से मुझको तेरी झलक नही दिखती.

उस आइने का भी क्या फयदा अब मेरे घर में,
जिस आइने मे मुझको तेरी तसवीर नही दिखती.

ये कोई शाजिश है या हुशन तेरे का है कोई जादू.
जब तक देख ना ले तुझको, बागों में कोई कली नही खिलती.

हर मर्ज़ की दवा है, फिर भी दर बदर भटकता रहता हूँ,
हो ना दीदार तेरा जब तक, ये मेरी साँसे नहीं चलती.

ये इश्क़ है या सजा है कोई रब की,

ये इश्क़ है या सजा है कोई रब की,
देख लूँ मै चाहे तुझको जितना, मगर मेरी आँखो की ये प्यास नहीं बुझती.

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