Amarendra Singh

वो जो मासूम से दिख रहे है, वही गुन्हेगार है मेरे इस हाल के….

वो जो मासूम से दिख रहे है, वही गुन्हेगार है मेरे इस हाल के,
दिल को लगा के दिल तोड़ जाना, ये आदत नहीं फ़ितरत है उसकी.

उसकी ख़ामोशी पर, ना जाने कितने फ़िदा हो गये,
चंद लफ्ज़ो में सब बयां कर जाना, ये आदत नहीं फ़ितरत है उसकी.

जो भी गुजरा उसकी गली से, वो बंजारा बन के रह गया,
भूले राही को और भटकाना, ये आदत नहीं फ़ितरत है उसकी.

अब तो चरचे उसके, सरेआम हो रहे है “अमर”,
क़तल कर के इल्ज़ाम लाश पर लगाना, ये आदत नहीं फ़ितरत है उसकी.

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