Amarendra Singh

तुम रहो महफूज़ इसलिये मै रातों को जागा करता हुँ…

तुम रहो महफूज़ इसलिये मै रातों को जागा करता हुँ,

मिलना होता है ना मेरा अपनो से मै तो बस उनकी यादों मे आया करता हुँ.

देख लेता हु मै खुदको अपनी ही परछाई मे,

कर के बंद आँखे अपनी मै ख्याबों को सजाया करता हुँ.

और कोई ये ना कह दे कि तुमको तो वफ़ा नही आती,

इसलिए मैं हर रोज उनकी बातों मे आया करता हुँ.

जब पूछती है माँ मेरी कि सब ख़ैरियत है वहाँ बेटा,

मैं मौत के पास होकर भी ख़ुदको महफूज़ बताया करता हुँ.

अब कैसे बताऊँ कि सरहदों पर कभी कोई अपने नही मिलते,

मै तिरंगे की छाओं को माँ तेरा आंचल बनाये रखता हुँ.

और जब जगती है ये दुनिया किसी जश्न ए बहार मे,

मै उस रात भी अपनी माँ को सजदे मे पाया करता हुँ.

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awesome post, very nicely written

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