Amarendra Singh

तेरे शहर में आज भी मुसाफ़िर बन कर आते है

 

तेरे शहर में आज भी मुसाफ़िर बन कर आते है,
सच तो ये है कि हम तेरा दीदार करने आते हैं…
इक तसव्वुर को तरसती रहती हैं ये निगाहें मेरी,
दो पल ही सही हम तुझसे मुलाक़ात करने आते हैं…
दर्द-ए-दिल अब छुपता नहीं छुपाने से,
हम एक बेवफ़ा से वफ़ा का इज़हार करने आते हैं…
और यूं ही मयखाने में वक़्त नहीं गुजारता अमर,
हम तेरे शहर में खुद को बर्बाद करने आते हैं…

 

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