Amarendra Singh

ना जाने किस हाल मे होंगी वो…

ना जाने किस हाल मे होंगी वो,
ना जाने उसको मेरी याद आती भी होगी की नहीं.

हर बात पर रूठ जाती थी जो मुझसे,
ना जाने उसको अब कोई मनाता भी होगा की नहीं.

उसकी आदत थी चीजों को रख के भूल जाना,
ना जाने उसको अब कोई याद दिलाता भी होगा की नहीं.

उस के चहरे पर जुल्फों का साया रहता था हर घड़ी,
ना जाने उनको अब कोई हटाता भी होगा की नहीं.

सहम जाती थी वो अंधेरे में सफ़र करते हुये,
ना जाने उसको अब कोई रस्ता दिखता भी होगा की नहीं.

हो गई होगी शायद वो मसरूफ़ इस जिंदगी में,
फिर भी मेरे याद करने पर, उसको हिचकिया आती होगी की नहीं.

भूल गई होगी वो अब तो चहेरा भी मेरा वक़्त के साथ,
क्या भूले से भी कभी उसे, मेरी तस्वीर नज़र आती होगी की नहीं.

ना जाने किस हाल मे होंगी वो,
ना जाने उसको मेरी याद आती भी होगी की नहीं.

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