Amarendra Singh

इक दिया

इक दिया मेरे नाम से भी जला देना,
मुझको सरहदों पर कोई रोशनी दिखाई नहीं देती.

होती तो है हर रोज आतिशबाज़ी यहाँ,
फिर भी मुझको किसी के हसने की आवाज़ सुनाई नही देती.

कोई आकर लगायेगा गले सामने से मुझको,
ऐसी दूर दूर तक मुझे कोई उम्मीद दिखाई नही देती.

रंग कितने है कायनात में, ये भूल गया हूँ मैं,
यहाँ खून के सिवा किसी रंग से होली मनाई नहीं जाती.

कोई मिलता नहीं यहाँ हस के, ना कोई घर पर अपने बुलाता है,
ईद आती तो है, मगर मिलकर मनाई नही जाती.

ना जाने किस शहर मे आकर बस गया हूँ मैं “अमर”,
यहाँ इंसान तो है, मगर इंसानियत नज़र नहीं आती.

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